बम की पूजा बनाम बम का दर्शन

यद्यपि, भारत की स्वतंत्रता का श्रेय महात्मा गांधी की अहिंसक विचारधारा को दिया जाता है, तथापि चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, नेताजी सुभाष बोस जैसे लोगों की क्रांतिकारी विचारधारा ने भी भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में मील के पत्थर का काम किया है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गाँधी और भगत सिंह, दो भिन्न विचारधाराओ के प्रतीक माने जाते है।

► 1925-30 के मध्य क्रांतिकारी और अहिंसक सिद्धांतों का आपसी टकराव, अपनी चरम सीमा पर था।

► ‘बम का दर्शनशास्त्र’ इसी मतभेद का एक नतीजा था।

पृष्ठभूमि:

► 23 दिसंबर, 1929 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश वाइसराय लॉर्ड इर्विन को ले जा रही स्पेशल ट्रेन को दिल्ली-आगरा रेलवे लाइन पर बम से उड़ाने का असफल प्रयास किया।

► गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ (अंग्रेजी), के 2 जनवरी, 1930 के अंक में, इस घटना की निंदा करते हुए, एक कटुतापूर्ण लेख  बम की पूजा लिखा, जिसमें उन्होनें वाइसराय को देश का शुभचिंतक और नवयुवकों को आजादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले कहा।

► गांधीजी ने लिखा:

  • भारत के राजनैतिक विचार रखने वाले वातावरण में हम लोगों के चारों और इतनी ज्यादा हिंसा व्याप्त है कि कभी इधर तो कभी उधर बमों के फेंके जाने से किसी को कोई परेशानी महसूस नहीं होती; और शायद ऐसी किसी घटना के हो जाने पर कुछ लोगों के दिलों में खुशी तक होती है। यदि मैं यह जानता होता कि यह हिंसा किसी हिलाये गये तरल पदार्थ में ऊपर के तल पर उठकर आया हुआ झाग ही है, तो शायद मैं निकट भविष्य में अहिंसा से स्वतंत्रता दिला सकने में सफल होने के बारे में निराश हो जाता। हिंसा या अहिंसा का सिद्धांत मानने वाले हम सब लोग ही स्वतंत्रता के लिए प्रयत्ननशील हैं। खुशकिस्मती से पिछले लगभग 12 महीनों में भारत के अपने दौरे के अनुभवों के आधार पर मुझे ऐसा कुछ विश्वास हो गया है कि देश की विशाल जनता जो इस तत्व से वाकिफ है कि हमें स्वतंत्रता प्राप्त करनी ही है, हिंसा की भावना से अछूती है। इसलिए वाइसराय की रेलगाड़ी नीचे हुए बम विस्फोटों की तरह होने वाले इक्केदुक्के हिंसापूर्ण विस्फोटों के बावजूद मैं यह मानता हूं कि हमारे राजनीतिक संघर्ष में अहिंसा की जड़ें जम गई हैं।
  • यदि हम इतना ही समझ लें कि सिर्फ विदेशियों को डरा कर ही हमें स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होगी, बल्कि खुद भय त्याग कर और ग्रामीण मित्रों को अपना भय त्यागना सिखला कर हम सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करेंगे, तो यह बात तुरत हमारी समझ में जायेगी कि हिंसा आत्मघातक है।
  • अन्य देशों में हिंसात्मक कार्यवाहियों का चाहे जो परिणाम हुआ हो और अहिंसा के दर्शन का हवाला दिये बिना भी यह समझने में कुछ बौद्धिक प्रयत्न की जरूरत नहीं है कि यदि हम प्रगति में बाधा डालने वाले उन अनेक दोषों से समाज को मुक्त कराने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं तो हम केवल अपनी कठिनाइयां ही बढ़ायेंगे और इससे स्वतंत्रता का दिन और भी दूर हटेगा। जो लोग सुधारों की आवश्यकता नहीं समझते क्योंकि वे उनके लिए तैयार नहीं है, सुधारों के जबर्दस्ती लाये जाने पर वे क्रोध से पागल हो उठेंगे और बदला लेने के लिए विदेशों की मदद मागेंगे।

बम का दर्शन:

गांधीजी के पत्र के जवाब में ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की ओर से भगवतीचरण वोहरा, भगत सिंह और यशपाल ने ‘बम का दर्शन’ लेख लिखा. जिसका शीर्षक “हिन्दुस्तान प्रजातंत्र समाजवादी सभा का घोषणापत्र” था।

► 26 जनवरी, 1930 को इसे देशभर में बाँटा गया।

► इस घोषणापत्र के माध्यम से क्रांतिकारियों ने अपने विचारो को भारत के लोगो तक पहुंचने का प्रयत्न किया ।

► क्रांतिकारियों ने ‘बम का दर्शन’ में सिर्फ गांधीजी द्वारा लिखे हुए लेख की ही आलोचना नहीं की बल्कि अपने विचारों और उद्देश्यों को भी रेखांकित किया. क्रांतिकारियों ने कांग्रेस के तरीकों पे भी सवाल उठाये और देशवाशियों से आग्रह किया की वो लोग भी उनके साथ जुड़े।

► इस घोषणापत्र में कांग्रेस के प्रयासों को विफल मानते हुए, क्रांतिकारियों ने लिखा की यदि बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो भारत का एक शत्रु उचित सज़ा पा जाता।

ِ► ‘बम का दर्शन’ के कुछ अंश:

  • एक क्रांतिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है तो वह उनकी माँग करता है, अपनी उस माँग के पक्ष में दलीलें देता है, समस्त आत्मिक शक्ति के द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए अत्यधिक कष्ट सहन करता है,इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल प्रयोग भी करता है। इसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारें,परंतु आप इन्हें हिंसा के नाम से सम्बोधित नहीं कर सकते,क्योंकि ऐसा करना कोष में दिए इस शब्द के अर्थ के साथ अन्याय होगा।
  • हम प्रत्येक देशभक्त से निवेदन करते हैं कि वह हमारे साथ गम्भीरतापूर्वक इस युद्ध में शामिल हो। कोई भी व्यक्ति अहिंसा और ऐसे ही अजीबोगरीब तरीकों से मनोवैज्ञानिक प्रयोग कर राष्ट्र की स्वतन्त्रता के साथ खिलवाड़ करे। स्वतन्त्रता राष्ट्र का प्राण है। हमारी गुलामी हमारे लिए लज्जास्पद है, जाने कब हममें यह बुद्धि और साहस होगा कि हम उससे मुक्ति प्राप्ति कर स्वतन्त्र हो सकें? हमारी प्राचीन सभ्यता और गौरव की विरासत का क्या लाभ, यदि हममें यह स्वाभिमान रहे कि हम विदेशी गुलामी, विदेशी झण्डे और बादशाह के सामने सिर झुकाने से अपने आप को रोक सकें।
  • क्या यह अपराध नहीं है कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया? हमें भिखारी बनाया, हमारा समस्त खून चूस लिया?एक जाति और मानवता के नाते हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है। क्या जनता अब भी चाहती है कि इस अपमान को भुलाकर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें। हम बदला लेंगे, जो जनता द्वारा शासकों से लिया गया न्यायोचित बदला होगा। कायरों को पीठ दिखाकर समझौता और शान्ति की आशा से चिपके रहने दीजिए। हम किसी से भी दया की भिक्षा नहीं माँगते हैं और हम भी किसी को क्षमा नहीं करेंगे। हमारा युद्ध विजय या मृत्यु के निर्णय तक चलता ही रहेगा।
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